
Bhagyo ka pher: दक्षिण भारत के गोकर्णनगर में श्रुत सेन नाम के एक दयालु राजा का शासन था। प्रजा उन्हें मानती थी, लेकिन राजा के मन में शांति नहीं थी। उनका महल रत्न और माणिक्य से जगमगाता था, लेकिन उनके जीवन में कोई जीवनसाथी नहीं था। मनचाही रानी न मिलने के कारण राजा का दिल खालीपन से भरा था।
एक दिन, जब राजा उदासी में डूबे हुए थे, एक ज्ञानी ब्राह्मण राजसभा में आए। राजा के दुख की छाया उनकी नजरों से बच नहीं पाई। धीमी, शांत आवाज में ब्राह्मण ने कहा, “महाराज, नियति का विधान अटल है। शोक न करें। विधि के लिखे को कौन बदल सकता है? आपके दुख को कम करने के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ।”
लोभ और मोह मानव जीवन में विनाश लाते हैं
ब्राह्मण ने एक गाँव की कहानी शुरू की, “एक गाँव में यজ্ঞदत्त, सोमदत्त और विश्वदत्त नाम के तीन ब्राह्मण भाई रहते थे। वे सगे भाई थे। यজ্ঞদत्त और सोमদत्त, बड़े और मझले, विवाहित थे। लेकिन छोटा विश्वदत्त अभी भी अविवाहित, सरल मन और थोड़ा मूर्ख स्वभाव का था। उनकी दोनों भाभी, बड़े भाई की पत्नी और मझले भाई की पत्नी, उससे तरह-तरह के काम करवाती थीं।
जरा सी गलती होने पर गाली-गलौज मिलती, और पति के सामने शिकायतें होतीं। भाभीओं की शिकायतों से तंग आकर दोनों भाइयों ने मिलकर अपने छोटे भाई को सबक सिखाने की योजना बनाई। उन्होंने विश्वदत्त को अपने खेतों में खेती के कठिन काम में लगा दिया।

विश्वदत्त सरल ज़रूर था, लेकिन उसके मन में स्वाभिमान था। दादा के खेत में कुदाल न चलाते हुए, वह गाँव के किनारे, बंजर जमीन पर मिट्टी खोदने लगा। गाँव के अन्य किसानों ने उसे मना किया, “वहाँ कुदाल मत चलाओ, बेटा! वह जगह बंजर मिट्टी है, साँपों का घर है।” लेकिन विश्वदत्त ने किसी की नहीं सुनी।
‘भले ही नियति की चाल समझ से परे हो, लेकिन सच्चाई के रास्ते पर चलने से अंत में अच्छाई ही मिलती है
मन के दुख और अभिमान में वह कुदाल चलाता रहा। और क्या आश्चर्य! साँप तो दूर, मिट्टी खोदते ही मोहरों से भरी दो कलशियाँ निकल आईं। दूसरे किसानों ने आँखें फैलाकर कहा, “यह तो साक्षात लक्ष्मी का लाभ है! कलशियाँ अपने पास रख लो, किसी को मत देना।” लेकिन विश्वदत्त दूसरी मिट्टी का बना था। सोना-मोहरों का लालच उसके मन को डिगा नहीं सका। शाम को, वह दोनों कलशियाँ लेकर सीधा घर लौटा, और जाकर अपने बड़े भाई यজ্ঞদत्त और मझले भाई सोमदत्त के हाथों में दे दीं।
लेकिन लालच बहुत बुरी चीज है। ईर्ष्या और द्वेष मानो उनके मन में घर कर गए थे। छोटे भाई के प्रति कृतज्ञता तो दूर, बल्कि उनके मन में एक नई कुटिल सोच पैदा हो गई। सोचने लगे, अगर भविष्य में विश्वदत्त इन मोहरों का हिस्सा मांगे तो? इसी आशंका में उन्होंने छोटे भाई को रास्ते से हटाने की घिनौनी योजना बनाई। एक दिन, मौका देखकर, उन्होंने विश्वदत्त को पकड़कर हाथ-पैर बांध दिए।
‘अहिंसा परम धर्म’ | Bhagyo ka pher Moral Story in Hindi
तेज चाकू से इस तरह वार किया कि बचने की कोई उम्मीद न रहे। फिर, बेहोश शरीर को घसीटकर जंगल में फेंक आए। लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। संयोग से, विश्वदत्त की जान बच गई। कुछ दिनों बाद जब वह कमजोर शरीर के साथ लंगड़ाता हुआ घर लौटा, तो उसने एक भयानक दृश्य देखा। घर के आँगन में उसके दोनों दादों के मृत शरीर पड़े थे।
घर के अंदर सब कुछ अस्त-व्यस्त था, और भाभीओं का कोई निशान नहीं था, मानो हवा में घुल गई हों। मोहरों का लालच त्याग कर विश्वदत्त ने पैतृक जमीन-जायदाद पर ही ध्यान दिया। चरित्र में ईमानदार और हिंसा से मुक्त होकर, वह शांति से जीवन बिताने लगा।”
ब्राह्मण चुप हो गए। फिर राजा की ओर देखकर बोले, “महाराज, जो व्यक्ति चरित्रवान होता है, जिसके मन में हिंसा को स्थान नहीं मिलता, दुख कभी उसे छू नहीं सकता।”

थोड़ी देर रुककर ब्राह्मण फिर शुरू हुए, “महाराज, अब आपके लिए एक शुभ समाचार है। बसंतसेन नाम के एक राजा हैं, उनकी पुत्री की सुंदरता तीनों लोकों में दुर्लभ है। नाम है विद्युतलता। उस रत्न को आप ग्रहण करें।” विद्युतलता की सुंदरता से मुग्ध होकर राजा श्रुत सेन ने उनसे विवाह कर लिया। राजा का खाली दिल मानो भर गया।
लेकिन कुछ दिन बीतते ही राजा का मन भटक गया। नियति का फेर शायद इसी को कहते हैं। राजा ने दूसरी बार एक और राजकुमारी से विवाह कर लिया। विद्युतलता, सती नारी, इस अपमान को सहन नहीं कर पाईं और दुख और अभिमान में प्राण त्याग दिए। विद्युतलता के शोक में डूबे राजा श्रुत सेन भी ज्यादा दिन नहीं जिए। राजा के बिना, राज्य का रक्षक न होने के कारण, दूसरी पत्नी भी असहाय होकर जीवन गँवा बैठीं। इस प्रकार, राजा श्रुत सेन का राजसी वैभव समय की धारा में विलीन हो गया।”
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कहानी की नीति: Moral
Hindi Story ‘Bhagyo ka pher’ se humne sikha सच्चा चरित्र और अहिंसा ही परम धर्म है। लालच और मोह माया मनुष्य के जीवन में तबाही लाते हैं। भले ही नियति की चाल समझ से परे हो, लेकिन सच्चाई के रास्ते पर चलने से अंत में कल्याण प्राप्त होता है।
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