शेर और चूहे की कहानी पढ़िए: जब शिकारी के जाल में फँसे शेर को नन्हे चूहे ने बचाया। बच्चों के लिए सीख और सवाल-जवाब के साथ।
शेर और चूहे की कहानी: छोटा समझकर किसी को कमज़ोर मत आँकना
शेर और चूहे की कहानी हम सबने बचपन में किसी न किसी से सुनी है। दादी-नानी की गोद में बैठकर, या स्कूल की किताब में। लेकिन इसकी सीख इतनी गहरी है कि बड़े होकर भी रिश्तों और काम में बार-बार याद आती है। आज इसे इत्मीनान से, पूरे विस्तार के साथ पढ़िए और अपने बच्चों को भी सुनाइए।
घने जंगल का राजा और उसकी दिनचर्या

बहुत पुरानी बात है। एक घने, हरे-भरे जंगल में एक शेर रहता था। उसकी गर्दन पर सुनहरे बालों की घनी अयाल थी और जब वह गरजता तो पूरा जंगल काँप उठता था। हिरन, खरगोश, बंदर, सब उसकी आहट सुनकर रास्ता बदल लेते थे।
शेर का रोज़ का नियम था। सुबह-सुबह वह शिकार के लिए निकलता, दोपहर तक पेट भरता और फिर अपनी गुफा के पास वाले बड़े बरगद की ठंडी छाँव में आकर पसर जाता। वहाँ पत्तों से छनकर आती धूप और हल्की हवा में उसे ऐसी गहरी नींद आती कि घंटों किसी बात की सुध नहीं रहती।
उसी बरगद की जड़ों के पास, मिट्टी के एक छोटे-से बिल में एक नन्हा चूहा अपने परिवार के साथ रहता था। चूहा बहुत फुर्तीला, चंचल और थोड़ा जिज्ञासु था। हर रोज़ वह दूर से शेर को सोते हुए देखता और मन ही मन सोचता, “इतना बड़ा, इतना ताकतवर! काश कभी मैं भी इसके किसी काम आ पाता।” फिर अपनी ही सोच पर हँस पड़ता, “मैं और शेर के काम? क्या बात करता हूँ!”
अँधेरी रात में हुई एक भूल

एक रात आसमान में बादल छाए थे और चाँद का कहीं पता नहीं था। चारों तरफ घुप्प अँधेरा। चूहा अपने बिल से निकला, क्योंकि उसे भूख लगी थी और पास की झाड़ी में गिरे कुछ दाने ढूँढने थे। वह तेज़ी से दौड़ रहा था, तभी उसने ठीक से देखा ही नहीं कि सामने कुछ बड़ा-सा पड़ा है। वह उस पर चढ़ गया और पूरे ज़ोर से दौड़ता हुआ दूसरी ओर उतर गया।
वह “कुछ” था सोता हुआ शेर।
शेर की नींद एक झटके में टूट गई। उसने आँख खोली, ज़ोर से गुर्राया और बिजली की तेज़ी से अपना भारी पंजा चूहे के ऊपर रख दिया। चूहा हवा में उछलकर सीधे पंजे के नीचे आ गया।
“किसकी इतनी हिम्मत हुई कि जंगल के राजा की नींद खराब करे?” शेर गरजा।
चूहे की विनती और शेर की हँसी

चूहा थर-थर काँप रहा था। उसकी साँस गले में अटक गई थी। फिर भी उसने हिम्मत जुटाई और दोनों नन्हे हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। अँधेरे में मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरे छोटे-छोटे बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।”
शेर ने उसे अपनी आँखों के सामने उठाया। इतना नन्हा सा जीव! उसके पूरे पंजे के एक कोने में भी मुश्किल से समाता था। शेर को अचानक हँसी आ गई। वह ठहाका मारकर बोला, “तू? तू मुझे गुस्सा दिला रहा है? तू तो मेरे एक निवाले के बराबर भी नहीं।”
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चूहे ने दबी आवाज़ में कहा, “महाराज, मैं बहुत छोटा हूँ, यह सच है। लेकिन अगर आप मुझे जाने देंगे तो मैं कभी इस एहसान को नहीं भूलूँगा। एक दिन ज़रूर आपके काम आऊँगा।”
यह सुनकर शेर और ज़ोर से हँसा। “तू और मेरे काम आएगा? चल, इस बात पर ही तुझे छोड़ देता हूँ। जा, भाग जा।”
शेर ने पंजा हटाया। चूहा “धन्यवाद, महाराज, धन्यवाद!” कहता हुआ अपने बिल में घुस गया। उस रात वह सो नहीं पाया, लेकिन उसके मन में एक बात पक्की बैठ गई थी: इस दया का कर्ज़ मुझे एक दिन चुकाना है।
जंगल में बिछा शिकारियों का जाल

कुछ हफ्ते बीत गए। एक सुबह जंगल के किनारे कुछ शिकारी आए। वे कई दिनों से बड़े शेर की ताक में थे। उन्होंने मोटी, मज़बूत रस्सियों से एक बड़ा जाल बुना और उसे जंगल के एक संकरे रास्ते पर बिछा दिया। ऊपर से पत्तों और घास से ढँककर वे दूर झाड़ियों में छिप गए।
उसी रास्ते से शेर रोज़ शिकार पर जाता था। उस दिन भी वह अपनी मस्त चाल में निकला। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि आगे ज़मीन के नीचे क्या बिछा है। जैसे ही उसका पैर जाल पर पड़ा, रस्सियाँ झटके से ऊपर खिंच गईं और शेर पूरा का पूरा उसमें लिपट गया।
शेर की बेबसी

शेर ने पूरा ज़ोर लगाया। पंजों से रस्सियाँ खींचीं, दाँतों से काटने की कोशिश की, पूरे शरीर को झटका दिया। लेकिन जितना वह हिलता, रस्सियाँ उतनी ही और कसती जातीं। जल्दी ही उसकी साँस फूलने लगी। उसकी गरज अब दहाड़ से बदलकर दर्द भरी पुकार बन गई थी।
जंगल के बाकी जानवरों ने उसकी आवाज़ सुनी। हिरन, बंदर, खरगोश और भालू, सबने सुनी। लेकिन कोई पास नहीं आया। सब सोच रहे थे, “यह तो शेर है। हम इसके पास गए तो कहीं हमें ही न खा जाए।” हर कोई अपनी जगह पर ठिठका रहा। शेर को पहली बार महसूस हुआ कि ताकत होते हुए भी वह कितना अकेला है।
जब चूहे ने दहाड़ पहचानी

शेर की वह पुकार चूहे के कानों में भी पड़ी। वह उस समय अपने बिल के पास ही दाने बीन रहा था। आवाज़ सुनते ही उसने पहचान लिया, “यह तो वही दहाड़ है! मेरे महाराज की आवाज़ है। ज़रूर किसी मुसीबत में हैं।”
उसके मन में एक पल को डर भी आया, “मैं इतना छोटा सा, क्या कर पाऊँगा?” लेकिन अगले ही पल उसे अपना वादा याद आ गया। वह दौड़ पड़ा। घास, पत्तों और पत्थरों के बीच से होता हुआ वह उस जगह पहुँचा जहाँ शेर जाल में फँसा पड़ा था।
“महाराज!” चूहे ने पुकारा।
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शेर ने थकी आँखों से नीचे देखा। उसकी आँखों में हैरानी थी। “तू? तू यहाँ क्या करने आया है? क्या मेरा मज़ाक उड़ाने?”
“नहीं, महाराज,” चूहा बोला। “आपने मेरी जान बख्शी थी। आज मुझे अपना वादा निभाने का मौका मिला है। आप शांत रहिए और हिलिएगा नहीं।”
नन्हे दाँतों की बड़ी ताकत

चूहा सबसे मोटी रस्सी पर चढ़ गया और अपने तेज़, नन्हे दाँतों से उसे कुतरने लगा। खट, खट, खट। रस्सी बहुत मज़बूत थी। कई बार उसके दाँत दुखने लगे, मुँह में रेशे भर गए, थकान से आँखें बंद होने लगीं। पर वह रुका नहीं। वह खुद से कहता रहा, “बस एक और रस्सी, बस एक और।”
शेर चुपचाप देखता रहा। उसके मन में अजीब-सी हलचल थी। जिस जीव को उसने तुच्छ समझकर हँसी में छोड़ दिया था, वही आज रात-भर की मेहनत से उसकी जान बचाने में लगा था।
धीरे-धीरे एक के बाद एक रस्सियाँ कटने लगीं। जाल ढीला पड़ने लगा। और आख़िर में जब सुबह की पहली किरण जंगल में उतरी, तब जाल का आख़िरी धागा भी टूट गया। शेर एक झटके में बाहर निकल आया और ज़ोर से साँस ली।
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दो अनोखे दोस्तों की शुरुआत

शेर कुछ देर बोल ही नहीं पाया। फिर उसने धीरे से अपना सिर चूहे के सामने झुकाया और कहा, “मित्र, मैंने तुम्हें छोटा समझकर तुम्हारी बात पर हँसा था। आज तुम्हीं ने मेरी जान बचाई। मुझे क्षमा करना।”
चूहा मुस्कुराया। “महाराज, आपने भी तो उस रात मुझे नया जीवन दिया था। हम दोनों ने एक-दूसरे का कर्ज़ चुका दिया।”
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उसी दिन से जंगल में एक अनोखी दोस्ती शुरू हुई। शेर कभी चूहे को अपनी पीठ पर बैठाकर घुमाता, कभी चूहा शेर की अयाल में बैठकर पूरे जंगल की ख़बर सुनाता। बाकी जानवर हैरान होकर देखते रहते। जिसके पास ताकत थी और जिसके पास हिम्मत थी, वे दोनों एक हो गए थे।
शेर और चूहे की कहानी से सीख

- किसी को उसके आकार, उम्र या हैसियत से कमज़ोर मत समझो।
- किसी पर की गई छोटी-सी दया भी बुरे वक्त में लौटकर आती है।
- सच्ची दोस्ती में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता।
- जब बाकी सब पीछे हट जाएँ, तब आगे बढ़कर मदद करने वाला ही असली साथी है।
नीतिकथा: “दया का बीज बोओगे तो मुसीबत में सहारे की फसल मिलेगी।”
1. शेर और चूहे की कहानी से क्या सीख मिलती है?
Ans. यही कि कोई भी इंसान या जीव छोटा नहीं होता, और किसी पर किया गया उपकार कभी बेकार नहीं जाता।
2. चूहे ने शेर को कैसे बचाया?
Ans. चूहे ने रात भर अपने तेज़ दाँतों से शिकारी के जाल की रस्सियाँ एक-एक करके कुतर दीं, जिससे शेर आज़ाद हो गया।
3. शेर ने चूहे को क्यों छोड़ दिया था?
Ans. चूहे की विनती सुनकर शेर को दया आ गई, और उसे लगा कि इतने छोटे जीव को मारने से कुछ हासिल नहीं होगा।
4. यह कहानी किस उम्र के बच्चों के लिए ठीक है?
Ans. यह कहानी 4 से 10 साल के बच्चों के लिए बहुत उपयुक्त है और स्कूल की नैतिक शिक्षा में भी काम आती है।